प्रकृति पर कविता Hindi Poems on Nature

Hindi Poems on Nature | प्रकृति पर कविताएँ| प्रकृति पर हिंदी बाल कविताएँ

अगर आप Hindi Poems on Nature ढूंढ रहे है तो यहाँ आपको बहुत सारे प्रकृति पर कविताएँ मिल जाएंगे |

प्रकृति के बिना हमारा जीवन अधूरा है | प्रकृति है तो हम है | यहाँ प्रक्रियति की जितना तरफ किया जाए उतना काम लगता है लेकिन एक कवी ही अपने कविता के द्वारा प्रकृति मॉ का सौंदर्य के के बारे में वर्णन कर सकता है |

प्रकृति को बचाये रखना हमारा कर्तव्य है और हम जितना ज्यादा प्रकृति को महत्व दे उतना ज्यादा हमारे लिए अच्छा होगा इसी कारणवश भारत सर्कार ने १-१० तक पड़ने वाले बचो को प्रकृति का महत्व बताने के लिए किताबे में बहुत सारे प्रकृति पर कविताएँ दी गयी है | आज हम देखेनेग कुछ बेहेतरीन कविताएँ प्रकृति पर|

1: प्रकृति संदेश / सोहनलाल द्विवेदी | प्रकृति का संदेश kavita

  • कविता का नाम :प्रकृति संदेश
  • कविता के लेखक : सोहनलाल द्विवेदी

पर्वत कहता शीश उठाकर,
तुम भी ऊँचे बन जाओ।
सागर कहता है लहराकर,
मन में गहराई लाओ।

समझ रहे हो क्या कहती हैं
उठ उठ गिर गिर तरल तरंग
भर लो भर लो अपने दिल में
मीठी मीठी मृदुल उमंग!

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो
कितना ही हो सिर पर भार,
नभ कहता है फैलो इतना
ढक लो तुम सारा संसार!

सोहनलाल द्विवेदी
प्रकृति संदेश Hindi Poems On Nature
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2: बसंत मनमाना | माखनलाल चतुर्वेदी | Nature Poem In Hindi

  • कविता का नाम :बसंत मनमाना
  • कविता के लेखक : माखनलाल चतुर्वेदी

चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ
तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ।

धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें
छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें,
दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर
किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर-
बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे
उनसे बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।
पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।

छोटे-छोटे खरगोशों से उठा-उठा सिर बादल
किसको पल-पल झांक रहे हैं आसमान के पागल?
ये कि पवन पर, पवन कि इन पर, फेंक नज़र की डोरी
खींच रहे हैं किसका मन ये दोनों चोरी-चोरी?
फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,
पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।

माखनलाल चतुर्वेदी
बसंत मनमाना Hindi Poems On Nature by माखनलाल चतुर्वेदी
बसंत मनमाना Hindi Poems On Nature by माखनलाल चतुर्वेदी

3: ये वृक्षों में उगे परिन्दे / माखनलाल चतुर्वेदी | कुदरत पर कविता | easy poem on nature in hindi

  • कविता का नाम :ये वृक्षों में उगे परिन्दे
  • कविता के लेखक : माखनलाल चतुर्वेदी

ये वृक्षों में उगे परिन्दे
पंखुड़ि-पंखुड़ि पंख लिये
अग जग में अपनी सुगन्धित का
दूर-पास विस्तार किये।

झाँक रहे हैं नभ में किसको
फिर अनगिनती पाँखों से
जो न झाँक पाया संसृति-पथ
कोटि-कोटि निज आँखों से।

श्याम धरा, हरि पीली डाली
हरी मूठ कस डाली
कली-कली बेचैन हो गई
झाँक उठी क्या लाली!

आकर्षण को छोड़ उठे ये
नभ के हरे प्रवासी
सूर्य-किरण सहलाने दौड़ी
हवा हो गई दासी।

बाँध दिये ये मुकुट कली मिस
कहा-धन्य हो यात्री!
धन्य डाल नत गात्री।
पर होनी सुनती थी चुप-चुप
विधि -विधान का लेखा!
उसका ही था फूल
हरी थी, उसी भूमि की रेखा।

धूल-धूल हो गया फूल
गिर गये इरादे भू पर
युद्ध समाप्त, प्रकृति के ये
गिर आये प्यादे भू पर।

हो कल्याण गगन पर-
मन पर हो, मधुवाही गन्ध
हरी-हरी ऊँचे उठने की
बढ़ती रहे सुगन्ध!

पर ज़मीन पर पैर रहेंगे
प्राप्ति रहेगी भू पर
ऊपर होगी कीर्ति-कलापिनि
मूर्त्ति रहेगी भू पर।।

माखनलाल चतुर्वेदी

4: प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है / श्रीकृष्ण सरल | प्रकृति का संदेश kavita | nature poems in hindi for class 10

  • कविता का नाम :प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है
  • कविता के लेखक : श्रीकृष्ण सरल

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है,
मार्ग वह हमें दिखाती है।
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

नदी कहती है’ बहो, बहो
जहाँ हो, पड़े न वहाँ रहो।
जहाँ गंतव्य, वहाँ जाओ,
पूर्णता जीवन की पाओ।
विश्व गति ही तो जीवन है,
अगति तो मृत्यु कहाती है।
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

शैल कहतें है, शिखर बनो,
उठो ऊँचे, तुम खूब तनो।
ठोस आधार तुम्हारा हो,
विशिष्टिकरण सहारा हो।
रहो तुम सदा उर्ध्वगामी,
उर्ध्वता पूर्ण बनाती है।
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

वृक्ष कहते हैं खूब फलो,
दान के पथ पर सदा चलो।
सभी को दो शीतल छाया,
पुण्य है सदा काम आया।
विनय से सिद्धि सुशोभित है,
अकड़ किसकी टिक पाती है।
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

यही कहते रवि शशि चमको,
प्राप्त कर उज्ज्वलता दमको।
अंधेरे से संग्राम करो,
न खाली बैठो, काम करो।
काम जो अच्छे कर जाते,
याद उनकी रह जाती है।
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

श्रीकृष्ण सरल

5: प्रकृति रमणीक है / जगदीश गुप्त | प्रकृति के गुणों पर कविता | Hindi Poems on Environment

  • कविता का नाम :प्रकृति रमणीक है
  • कविता के लेखक : जगदीश गुप्त

प्रकृति रमणीक है।
जिसने इतना ही कहा-
उसने संकुल सौंदर्य के घनीभूत भार को
आत्मा के कंधों पर
पूरा नहीं सहा!
भीतर तक
क्षण भर भी छुआ यदि होता-
सौंदर्य की शिखाओं ने,
जल जाता शब्द-शब्द,
रहता बस अर्थकुल मौन शेष।
ऐसा मौन-जिसकी शिराओं में,
सारा आवेग-सिंधु,
पारे-सा-
इधर-उधर फिरता बहा-बहा!
प्रकृति ममतालु है!
दूधभरी वत्सलता से भीगी-
छाया का आँचल पसारती,
-ममता है!
स्निग्ध रश्मि-राखी के बंधन से बांधती,
-निर्मल सहोदरा है!
बाँहों की वल्लरि से तन-तरू को
रोम-रोम कसती-सी!
औरों की आँखों से बचा-बचा-
दे जाती स्पर्शों के अनगूंथे फूलों की पंक्तियाँ-
-प्रकृति प्रणयिनी है!
बूंद-बूंद रिसते इस जीवन को, बांध मृत्यु -अंजलि में
भय के वनांतर में उदासीन-
शांत देव-प्रतिमा है!
मेरे सम्मोहित विमुग्ध जलज-अंतस्‌ पर खिंची हुई
प्रकृति एक विद्युत की लीक है!
ठहरों कुछ, पहले अपने को, उससे सुलझा लूँ
तब कहूँ- प्रकृति रमणीक है…

जगदीश गुप्त

6: प्रकृति और हम / अनातोली परपरा | प्रकृति पर कविता short | Heart touching Poem on Nature in Hindi

  • कविता का नाम :प्रकृति और हम
  • कविता के लेखक : अनातोली परपरा

जब भी घायल होता है मन
प्रकृति रखती उस पर मलहम
पर उसे हम भूल जाते हैं
ध्यान कहाँ रख पाते हैं

उसकी नदियाँ, उसके सागर
उसके जंगल और पहाड़
सब हितसाधन करते हमारा
पर उसे दें हम उजाड़

योजना कभी बनाएँ भयानक
कभी सोच लें ऐसे काम
नष्ट करें कुदरत की रौनक
हम, जो उसकी ही सन्तान

अनातोली परपरा
प्रकृति और हम / अनातोली परपरा Nature Poems in Hindi
प्रकृति और हम / अनातोली परपरा Nature Poems in Hindi
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7: प्रकृति और तुम / नीरजा हेमेन्द्र  | कविता | Hindi Poem on Prakriti Nature

  • कविता का नाम :प्रकृति और तुम
  • कविता के लेखक : नीरजा हेमेन्द्र

अब हो रही हैं /ऋतुएँ परिवर्तित
शनै…शनै…शनै…
परिवर्तन सृष्टि का विधान है
शश्वत् है, अटल है, अभेद्य है
प्रकृति और पुरूष भी आबद्ध हैं
प्रकृति के नियमों से
प्रकृति जो पुरूष की सहचरी है,
सहभागी है, अर्द्ध अस्तित्व है
 तब भी करता है वह प्रकृति को
आहत्/मर्माहत्
प्रकृति कभी नही करती उसका प्रतिकार
प्रतिवाद या कि विद्रोह
नदी का रूप धर
वह सागर के सागर के समीप
बहती चली जाती है
नैसर्गिक आकर्षण में आबद्ध
वह अपने हृदय में रखती है
विश्व द्वारा प्रक्षेपित कलुषताएँ
वह छोटी लताओं का रूप धर
वृक्षों के इर्द-गिर्द उग आती है
सहचरी -सी
वह उसकी ओर अग्रसर होती है
वृक्ष अपनी वृहदता पर
करता है मिथ्या अभिमान
वह होता है गर्वित
लताएँ वृक्ष से अपना शाश्वत् मोह
छोड़ नही पातीं
एक दिन वह वृक्ष को ढ़ँक लेती हैं
वृक्ष लताओं के अस्तित्व में
हो जाता है समाहित
वहाँ वृक्ष नही /दृष्टिगोचर होतीं हैं
सिर्फ लताएँ
प्रकृति ने अपने समर्पण से
प्रमाणित किया है कि प्रकृति
पुरूष के मिथ्या अभिमान को
तिरोहित करती थी/ तिरोहित करती है
तिरोहित करती रहेगी।

नीरजा हेमेन्द्र

8: प्रकृति के दफ़्तर में कविता / शरद कोकास | Hindi Nature Poem

  • कविता का नाम :प्रकृति के दफ़्तर में
  • कविता के लेखक : शरद कोकास

कल शाम गुस्से में लाल था सूरज
प्रकृति के दफ़्तर में हो रहा है कार्य-विभाजन
जायज़ हैं उसके गुस्से के कारण
अब उसे देर तक रुकना जो पड़ेगा

नहीं टाला जा सकता ऊपर से आया आदेश
काम के घंटों में परिवर्तन ज़रूरी है
यह नई व्यवस्था की माँग है
बरखा, बादल, धूप, ओस, चाँदनी
सब किसी न किसी के अधीनस्थ
बंधी-बंधाई पालियों में
काम करने के आदी
कोई भी अप्रभावित नहीं हैं

हवाओं की जेबें गर्म हो चली हैं
धूप का मिज़ाज़ कुछ तेज़
चांदनी कोशिश में है
दिमाग की ठंडक यथावत रखने की
बादल, बारिश, कोहरा छुट्टी पर हैं इन दिनों

इधर शाम देर से आने लगी है ड्यूटी पर
सुबह जल्दी आने की तैयारी में लगी है
दोपहर को नींद आने लगी है दोपहर में
सबके कार्य तय करने वाला मौसम
ख़ुद परेशान है तबादलों के इस मौसम में

खुश है तो बस रात
अब उसे अकेले नहीं रुकना पड़ेगा
वहशी निगाहों का सामना करते हुए
ओवरटाइम के बहाने देर रात तक

भोर, दुपहरी, साँझ, रात
सब के सब नये समीकरण की तलाश में
जैसे पुराने साहब की जगह
आ रहा हो कोई नया साहब ।

शरद कोकास

9: प्रकृति हूँ मैं ही कविता / जया पाठक श्रीनिवासन | Hindi Kavita Nature

  • कविता का नाम :प्रकृति हूँ मैं ही
  • कविता के लेखक : जया पाठक श्रीनिवासन

तो तुम्हे लगता है-
कि तुम प्रयोजन हो?
जानते हो –
कड़ी दर कड़ी
बढ़ती है
प्रकृति
ओज से भरी
अमृत से लबालब
विकसित फूलों की क्यारी सी
जिसमें
आते हो तुम
भटकते – भ्रमर से
इधर उधर
और बीजते हो
अगली फूलों की जमात
तुम्हारा आना और जाना यह
पल भर का
मेरी अनादी-अनंत की गति में
रह जाता
एक बिंदु मात्र
फिर भी,
तुम्हारी उम्र से नापकर
विधाता से
मांगती हूँ हमेशा
अपने लिए कुछ कम घड़ियाँ

जाने क्यों
लगता है मुझे भी
अक्सर
कि, तुम ही प्रयोजन हो !

जया पाठक श्रीनिवासन

10:प्रकृति-परी कविता / सुधा गुप्ता | Hindi Poem On Nature

प्रकृति परी
हाथ लिये घूमती
जादू की छड़ी
मोहक रूप धरे
सब का मन हरे

धरा सुन्दरी!
तेरा मोहक रूप
बड़ा निराला
निज धुन मगन
हर कोई मतवाला

वसन्त आया
बहुत ही बातूनी
हुई हैं मैना
चहकती फिरतीं
अरी, आ, री बहना

आम की डाली
खुशबू बिखेरती
पास बुलाती
‘चिरवौनी’ करती है
पिकी, चोंच मार के

चाँदनी स्नात
शरद-पूनो रात
भोर के धोखे
पंछी चहचहाते
जाग पड़ता वन

मायके आती
गंध मदमाती-सी
कली बेला की
वर्ष में एक बार
यही रीति-त्योहार

शेफाली खिली
वन महक गया
ॠतु ने कहा:
गर्व मत करना
पर्व यह भी गया

काम न आई
कोहरे की रज़ाई
ठण्डक खाई
छींक-छींक रजनी
आँसू टपका रही

दुग्ध-धवल
चाँदनी में नहाया
शुभ्र, मंगल
आलोक जगमग
हँस रहा जंगल

तम घिरा रे
काजल के पर्वत
उड़ते आए
जी भर बरसेंगे
धान-बच्चे हँसेंगे

घुमन्तू मेघ
बड़े ही दिलफेंक
शम्पा को देखा
शोख़ी पे मर मिटे
कड़की, डरे, झरे

बड़ी सुबह
सूरज मास्टर दा’
किरण-छड़ी
ले, आते-धमकाते
पंछी पाठ सुनाते

सलोनी भोर
श्वेत चटाई बिछा
नीले आँगन
फुरसत में बैठी
कविता पढ़ रही

फाल्गुनी रात
बस्तर की किशोरी
सज-धज के
‘घोटुल’ को तैयार
चाँद ढूँढ लिया है

वर्षा की भोर,
मेघों की नौका-दौड़
शुरू हो गई
‘रेफरी’ थी जो हवा,
खेल शामिल हुई

वन पथ में
जंगली फूल-गंध
वनैली घास
चीना-जुही लतर
सोई राज कन्या-सी

सज के बैठी
आकाश की अटारी
बालिका-बधू
नीला आँचल उठा
झाँके मासूम घटा

वर्षा से ऊबे
शरदाकाश तले
हरी घास पे
रंग-बिरंगे पंछी
पिकनिक मनाते

आज सुबह
आकाश में अटकी
दिखाई पड़ी
फटी कागज़ी चिट्ठी
आह! टूटा चाँद था!!

ज्वर से तपे
जंगल के पैताने
आ बैठी धूप
प्यासा बेचैन रोगी
दो बूँद पानी नहीं

कोयलिया ने
गाए गीत रसीले
कोई न रीझा
धन की अंधी दौड़
कान चुरा ले भागी

जी भर जीना
गाना-चहचहाना
पंछी सिखाते:
केवल वर्तमान
कल का नहीं भान

परिन्दे गाते
कृतज्ञता से गीत
प्रभु की प्रति:
उड़ने को पाँखें दीं
और चंचु को दाना

पौष का सूर्य
सामने नहीं आता
मुँह चुराता
बेवफ़ा नायक-सा
धरती को फुसलाता

धरा के जाये
वसन्त आने पर
खिलखिलाए
फूले नहीं समाए
मस्ती में गीत गाए

बहुत छोटा
तितली का जीवन
उड़ती रहे
पराग पान करे
कोई कुछ न कहे

जंगल गाता
भींगुर लेता तान
झिल्ली झंकारे
टिम-टिम जुगनू
तरफओं के चौबारे

अपने भार
झुका है हरसिंगार
फूलों का बोझ
उठाए नहीं बने
खिले इतने घने

सूरज मुखी
सूर्य दिशा में घूमें
पूरे दिवस
प्रमाण करते-से
भक्ति भाव में झूमें

पावस ॠतु:
प्रिया को टेर रहा
हर्षित मोर
पंख पैफला नाचता
प्रेम-कथा बाँचता

पेड़ हैरान
पूछें- हे भगवान्!
इंसानी त्मिप्सा
हम क्या करेंगे जी?
कट-कट मरेंगे जी?

हुई जो भोर
टुहँक पड़े मोर
देखा नशारा
नीली बन्दनवार
अक्षितिज सजी थी

छींेंटे, बौछार
भिगो, खिलखिलाता
शोख़ झरना
स्पफटिक की चादर
किसने जड़े मोती?

पाँत में खड़े
गुलमोहर सजे
हरी पोशाक
चोटी में गूँथे पूफल
छात्राएँ चलीं स्कूल

ठण्डी बयार
सलोनी-सी सुबह
मीठी ख़ुमारी
कोकिल कूक उठी
अजब जादूगरी

बढ़ता जाये
ध्रती का बुख़ार
आर न पार
उन्मत्त है मानव
स्वयंघाती दानव

दिवा अमल
सरि में हलचल
पाल ध्वल
खुले जो तट बँध्
नौका चली उछल

पेंफकता आग
भर-भर के मुट्ठी
धरा झुलसी
दिलजला सूरज
जला के मानेगा

रात के साथी
सब विदा हो चुके
पैफली उजास
अटका रह गया
पफीके ध्ब्बे-सा चाँद

आया आश्विन
मतवाला बनाए
हवा खुनकी
मनचीता पाने को
चाह पिफर ठुनकी

सृष्टि सुन्दरी
पिफर पिफर रिझाती
मत्त यौवना
टूट जाता संयम
अनादि पुरूष का

मैल, कीचड़
सड़े पत्तों की गंध्
लपेटे तन
बंदर-सी खुजाती
आ खड़ी बरसात

सिर पे ताज
पीठ पर है दाग्­ा
गीतों की रानी
गाती मीठा तरानाµ
वसन्त! पिफर आना

प्रिय न आए
बैठी दीप जलाए
आकाश तले
आँसू गिराती निशा
न रो, उषा ने कहा

गुलाबी, नीले
बैंगनी व ध्वल
रंग-निर्झर
सावनी की झाड़ियाँ
हँस रहीं जी भर

बुलबुल का
बहार से मिलन
रहा नायाब
गाती रही तराना
खिलते थे गुलाब

किसकी याद
सिर पटकती है
लाचार हवा
खोज-खोज के हारी
नहीं दर्द की दवा

आ गया पौष
लाया ठण्डी सौगातें
बप़्ार्फीली रातें
पछाड़ खाती हवा
कोई घर न खुला

सुधा गुप्ता

11: प्रकृति कविता / डी. एम. मिश्र | Nature Poem

विधाता रहस्य रचता है
मनुष्य विस्मय में डूब जाता है
फिर जैसी जिसकी आस
वैसी उसकी तलाश

नतीज़े दिखाकर
प्रकृति मुमराह नहीं करती
प्रकृति जानती है
वह बड़ी है
पर, आस्था और
विश्वास पर खड़ी है
जहाँ एक पूजा घर होने से
बहुत कुछ बच जाता है खोने से

अनन्त का आभास
निकट से होता है
एक आइना अपनी धुरी पर
धूमता हुआ
बहुत दूर निकल जाता है
तब क्या-क्या
सामने आता है

जटिलताओं का आभास
फूल-पत्तियों को कम
जड़ों और बारीक तंतुओं को ज्यादा होता है
जहाँ भाषा और जुबान का
कोई काम नहीं होता 

डी. एम. मिश्र
प्रकृति / डी. एम. मिश्र Nature Poems in Hindi
प्रकृति / डी. एम. मिश्र Nature Poems in Hindi

12: प्रकृति है वह कविता अंग्रेजी / एमिली डिकिंसन | English Nature Poems

प्रकृति है वह जो हम देखते हैं,
ये पहाड़ – वो दोपहर
गिलहरी – ग्रहण – भँवरा,
न, न, प्रकृति है स्वर्ग –
प्रकृति है वह जो हम सुनते हैं,
बोबोलिंक – समन्दर
तूफ़ान – क्रिकेट
न न, प्रकृति है समरसता,
प्रकृति वह है जो हम जानते हैं,
फिर भी वह रह जाती अनबूझी,
सच, उसकी सरलता के आगे,
हमारी विद्वता दिखती कितनी बौनी!

एमिली डिकिंसन

13: प्रकृति माँ कविता / मनोज चौहान | Nature par कविता

हे प्रकृति माँ ,
मैं तेरा ही अंश हूं,
लाख चाहकर भी,
इस सच्चाई को ,
झुठला नहीं सकता ।

मैंने लिखी है बेइन्तहा,
दास्तान जुल्मों की,
कभी अपने स्वार्थ के लिए,
काटे हैं जंगल,
तो कभी खेादी है सुंरगें,
तेरा सीना चीरकर ।

अपनी तृष्णा की चाह में,
मैंने भेंट चढ़ा दिए हैं,
विशालकाय पहाड.,
ताकि मैं सीमेंट निर्माण कर,
बना संकू एक मजबूत और,
टिकाऊ घर अपने लिए ।

अवैध खनन में भी ,
पीछे नहीं रहा हूँ ,
पानी के स्त्रोत,
विलुप्त कर,
मैंने रौंद डाला है,
कृषि भूमि के,
उपजाऊपन को भी l

चंचलता से बहते,
नदी,नालों और झरनों को,
रोक लिया है मैंने बांध बनाकर,
ताकि मैं विद्युत उत्पादन कर,
छू संकू विकास के नये आयाम l

तुम तो माता हो,
और कभी कुमाता,
नहीं हो सकती,
मगर मैं हर रोज ,
कपूत ही बनता जा रहा हूं।
अपने स्वार्थों के लिए ,
नित कर रहा हूँ ,
जुल्म तुम पर,
फिर भी तुमने कभी ,
ममता की छांव कम न की ।

दे रही हो हवा,पानी,धूप,अन्न
आज भी,
और कर रही हो,
मेरा पोषण हर रोज।

मनोज चौहान

14: देख प्रकृति की ओर कविता / शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

देख प्रकृति की ओर
मन रे! देख प्रकृति की ओर ।
क्यों दिखती कुम्हलाई संध्या
क्यों उदास है भोर
देख प्रकृति की ओर ।

वायु प्रदूषित नभ मंडल
दूषित नदियों का पानी
क्यों विनाश आमंत्रित करता है मानव अभिमानी
अंतरिक्ष व्याकुल-सा दिखता
बढ़ा अनर्गल शोर
देख प्रकृति की ओर ।

कहाँ गए आरण्यक लिखने वाले
मुनि संन्यासी
जंगल में मंगल करते
वे वन्यपशु वनवासी
वन्यपशु नगरों में भटके
वन में डाकू चोर
देख प्रकृति की ओर ।

निर्मल जल में औद्योगिक मल
बिल्कुल नहीं बहायें
हम सब अपने जन्मदिवस पर
एक-एक पेड़ लगाएँ
पर्यावरण सुरक्षित करने
पालें नियम कठोर
देख प्रकृति की ओर ।

जैसे स्वस्थ त्वचा से आवृत
रहे शरीर सुरक्षित
वैसे पर्यावरण सृष्टि में
सब प्राणी संरक्षित
क्षिति जल पावक गगन वायु में
रहे शांति चहुँ ओर
देख प्रकृति की ओर ।

शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

15: प्रकृति बिना मनुष्य कविता / रेखा चमोली

  • कविता का नाम :प्रकृति बिना मनुष्य
  • कविता के लेखक : रेखा चमोली

नदी तब भी थी
जब कोई उसे नदी कहने वाला न था
पहाड़ तब भी थे
हिमालय भले ही इतना ऊॅचा न रहा हो
ना रहे हों समुद्र में इतने जीव

नदी पहाड हिमालय समुद्र
तब भी रहंेगे
जब नहीं रहेंगे इन्हें पुकारने वाले
इन पर गीत लिखने वाले
इनसे रोटी उगाने वाले

नदी पहाड़ हिमालय समुद्र
मनुष्य के बिना भी
नदी पहाड़ हिमालय समुद्र हैं
इनके बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं।

रेखा चमोली

16:प्रकृति कविता / निधि सक्सेना | Poem on Beauty of Nature in Hindi

बरगद का वृक्ष देख कर
याद आते हैं बूढ़े दादा
कई हाथों से खुद को थामे
पुकारते
कि कुछ पल ठहरो
तनिक सुस्ता लो
घनी छाँव है मेरी

बाबा जैसा है पीपल
विशाल
अलौकिक
जो पतझड़ में भी
अपने कुछ पत्ते बचा लेता है
अपने बच्चों के लिए

केले का पेड़ देख कर याद आती हैं माँ
दुबली पतली
अपनी सीमित संपदा में भी
खनिजों से भरपूर खाद्य भंडार उत्पन्न कर लेतीं

अपने बगीचे में लगे नन्हे गुलाब देख
अपने बच्चे याद आते हैं
इन्हीं हाथों लगे
बढ़े
फले फूले

और पारिजात जैसे ‘तुम’
हर सांझ प्रेम ओढ़ लेते
पग में असंख्य तारे बिछाते
प्रतीक्षा में पुष्प बिछाते
भावों संग खिलते बुझते
झरते
भोर से पहले बिखर जाते
किसी उदास प्रेमी की तरह

सभी रिश्तों को
प्रकृति ने कैसे
अपनी हथेली में समेटा है.

निधि सक्सेना

17:प्रकृति में तुम कविता / पुष्पिता | Poems on Nature in Hindi

  • कविता का नाम :प्रकृति में तुम
  • कविता के लेखक : पुष्पिता

सूर्य की चमक में
तुम्हारा ताप है
हवाओं में
तुम्हारी साँस है
पाँखुरी की कोमलता में
तुम्हारा स्पर्श
सुगंध में
तुम्हारी पहचान।

जब जीना होता है तुम्हें
प्रकृति में खड़ी हो जाती हूँ
और आँखें
महसूस करती हैं
अपने भीतर तुम्हें।

मैं अपनी परछाईं में
देखती हूँ तुम्हें
परछाईं के काग़ज़ पर
लिखती हूँ गहरी परछाईं के
प्रणयजीवी शब्द।

तुम मेरी आँखों के भीतर
जो प्यार की पृथ्वी रचते हो
उसे मैं शब्द की प्रकृति में
घटित करती हूँ।

पुष्पिता

18:प्रकृति की ओर कविता / भरत प्रसाद | Hindi Poems On Nature

  • कविता का नाम :प्रकृति की ओर
  • कविता के लेखक : भरत प्रसाद

प्रातः बेला
टटके सूरज को जी भर देखे
कितने दिन बीत गए।
नहीं देख पाया
पेड़ों के पीछे उसे
छिप-छिपकर उगते हुए।
नहीं सुन पाया
भोर आने से पहले
कई चिड़ियों का एक साथ कलरव।
नहीं पी पाया
दुपहरी की बेला
आम के बगीचे में झुर-झुर बहती
शीतल बयार।

उजास होते ही
गेहूँ काटने के लिए
किसानों, औरतों, बच्चों और बेटियों का जत्था
मेरे गाँव से होकर
आज भी जाता होगा।
देर रात तक
आज भी
खलिहान में
पकी हुई फ़सलों का बोझ
खनकता होगा।
हमारे सीवान की गोधूलि बेला
घर लौटते हुए
बछड़ों की हर्ष-ध्वनि से
आज भी गूँजती होगी।

फिर कब देखूँगा?
गनगनाती दुपहरिया में
सघन पत्तियों के बीच छिपा हुआ
चिड़ियों का जोड़ा।
फिर कब सुनूँगा?
कहीं दूर
किसी किसान के मुँह से
रात के सन्नाटे में छिड़ा हुआ
कबीर का निर्गुन-भजन।
फिर कब छूऊँगा?
अपनी फसलों की जड़ें
उसके तने, हरी-हरी पत्तियाँ
उसकी झुकी हुई बालियाँ।

अपने घर के पिछवाड़े
डूबते समय
डालियों, पत्तियों में झिलमिलाता हुआ सूरज
बहुत याद आता है। अपने चटक तारों के साथ
रात में जी-भरकर फैला हुआ
मेरे गाँव के बगीचे में
झरते हुए पीले-पीले पत्ते
कब देखूँगा?
उसकी डालियों, शाखाओं पर
आत्मा को तृप्त कर देने वाली
नई-नई कोंपलें कब देखूँगा?

भरत प्रसाद

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