सोहनलाल द्विवेदी कविताएँ Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi Poems | सोहनलाल द्विवेदी कविताएं

अगर आप भी मेरी तरह Sohanlal Dwivedi Poems को पसंद करते है तो यहाँ आपके ललिए हम लाये है सोहनलाल द्विवेदी कविताएं |

सोहनलाल द्विवेदी भारत के एक कवि और स्वतंत्र सेनानी थे| इनके सर्व श्रेष्ट कविताओं के लिए इन्हे 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था। सोहनलाल द्विवेदी कविताएं बहुत ही सुप्रसिद्ध थे इसी कारण भारत सर्कार ने इन्हे राष्ट्र कवी घोषित किया | तो आइये पड़ते है Sohanlal Dwivedi Poems in Hindi.

Sohanlal Dwivedi Hindi Poems | सोहनलाल द्विवेदी कविताएं

  1. हिमालय कविता | सोहनलाल द्विवेदी | Himalaya Poem by Sohanlal Dwivedi
  2. कोशिश करने वालों की हार नहीं होती कविता | सोहनलाल द्विवेदी | Sohan Lal Dwivedi Koshish Karne Walon Ki Poem
  3. नववर्ष कविता | सोहनलाल द्विवेदी | sohan lal dwivedi kavitha
  4. बढे़ चलो, बढे़ चलो कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  5. मातृभूमि कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  6. तुम्हें नमन कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  7. आया वसंत आया वसंत कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  8. खादी गीत कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  9. भारत कविता | सोहनलाल द्विवेदी Short Poem Written by Sohanlal Dwivedi in Hindi
  10. वंदना कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  11. हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  12. हाथी और खरगोश कविता | सोहनलाल द्विवेदी
  13. मेंढक और साँप कविता | सोहनलाल द्विवेदी

हिमालय कविता | सोहनलाल द्विवेदी | Himalaya Poem by Sohanlal Dwivedi

युग युग से है अपने पथ पर
देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधायें आईं
उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में
हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ
रहता हरदम पड़ा हिमालय
तो भारत के शीश चमकता
नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आँधी पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर
सब कठिनाई तूफानी में!

डिगो न अपने प्रण से तो ––
सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
तुम भी ऊँचे हो सकते हो
छू सकते नभ के तारे!!

अचल रहा जो अपने पथ पर
लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको
जीने में मर जाने में!

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हिमालय_सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
हिमालय_सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती कविता | सोहनलाल द्विवेदी | Sohan Lal Dwivedi Koshish Karne Walon Ki Poem

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

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कोशिश करने वालों की हार नहीं होती_सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती_सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems

नववर्ष कविता | सोहनलाल द्विवेदी | sohan lal dwivedi kavitha

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;

मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;

श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;

जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!

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नववर्ष_सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
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बढे़ चलो, बढे़ चलो कविता | सोहनलाल द्विवेदी

न हाथ एक शस्त्र हो,
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न वीर वस्त्र हो,
हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर,
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

घटा घिरी अटूट हो,
अधर में कालकूट हो,
वही सुधा का घूंट हो,
जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

गगन उगलता आग हो,
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो,
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

चलो नई मिसाल हो,
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

अशेष रक्त तोल दो,
स्वतंत्रता का मोल दो,
कड़ी युगों की खोल दो,
डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

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बढे़ चलो, बढे़ चलो _ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
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मातृभूमि कविता | सोहनलाल द्विवेदी

ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।

गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली
पग पग छहर रही है।

वह पुण्य भूमि मेरी,
वह स्वर्ण भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।

गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।

वह युद्ध–भूमि मेरी,
वह बुद्ध–भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।

मातृभूमि_ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
मातृभूमि_ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems

तुम्हें नमन कविता | सोहनलाल द्विवेदी

चल पड़े जिधर दो डग, मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर ;
गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर,

जिसके शिर पर निज हाथ धरा
उसके शिर- रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गए उसी पर कोटि माथ ;

हे कोटि चरण, हे कोटि बाहु
हे कोटि रूप, हे कोटि नाम !
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम !

युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खीचते काल पर अमिट रेख ;

तुम बोल उठे युग बोल उठा
तुम मौन रहे, जग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना ;

युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक
युग संचालक, हे युगाधार !
युग-निर्माता, युग-मूर्ति तुम्हें
युग युग तक युग का नमस्कार !

दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम काल-चक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक !

हे युग-द्रष्टा, हे युग सृष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष मन्त्र ?
इस राजतंत्र के खण्डहर में
उगता अभिनव भारत स्वतन्त्र !

आया वसंत आया वसंत कविता | सोहनलाल द्विवेदी

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आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत।

आया वसंत आया वसंत_ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
आया वसंत आया वसंत_ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems

खादी गीत कविता | सोहनलाल द्विवेदी

खादी के धागे-धागे में अपनेपन का अभिमान भरा,
माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा।

खादी के रेशे-रेशे में अपने भाई का प्यार भरा,
मां-बहनों का सत्कार भरा, बच्चों का मधुर दुलार भरा।

खादी की रजत चंद्रिका जब, आकर तन पर मुसकाती है,
जब नव-जीवन की नई ज्योति अंतस्थल में जग जाती है।

खादी से दीन निहत्थों की उत्तप्त उसांस निकलती है,
जिससे मानव क्या, पत्थर की भी छाती कड़ी पिघलती है।

खादी में कितने ही दलितों के दग्ध हृदय की दाह छिपी,
कितनों की कसक कराह छिपी, कितनों की आहत आह छिपी।

खादी में कितनी ही नंगों-भिखमंगों की है आस छिपी,
कितनों की इसमें भूख छिपी, कितनों की इसमें प्यास छिपी।

खादी तो कोई लड़ने का, है भड़कीला रणगान नहीं,
खादी है तीर-कमान नहीं, खादी है खड्ग-कृपाण नहीं।

खादी को देख-देख तो भी दुश्मन का दिल थहराता है,
खादी का झंडा सत्य, शुभ्र अब सभी ओर फहराता है।

खादी की गंगा जब सिर से पैरों तक बह लहराती है,
जीवन के कोने-कोने की, तब सब कालिख धुल जाती है।

खादी का ताज चांद-सा जब, मस्तक पर चमक दिखाता है,
कितने ही अत्याचार ग्रस्त दीनों के त्रास मिटाता है।

खादी ही भर-भर देश प्रेम का प्याला मधुर पिलाएगी,
खादी ही दे-दे संजीवन, मुर्दों को पुनः जिलाएगी।

खादी ही बढ़, चरणों पर पड़ नुपूर-सी लिपट मना लेगी,
खादी ही भारत से रूठी आज़ादी को घर लाएगी।

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भारत कविता | सोहनलाल द्विवेदी | Short Poem Written by Sohanlal Dwivedi in Hindi

भारत तू है हमको प्यारा,
तू है सब देशों से न्यारा।

मुकुट हिमालय तेरा सुन्दर,
धोता तेरे चरण समुन्दर।

गंगा यमुना की हैं धारा,
जिनसे है पवित्र जग सारा।

अन्न फूल फल जल हैं प्यारे,
तुझमें रत्न जवाहर न्यारे!

राम कृष्ण से अन्तर्यामी,
तेरे सभी पुत्र हैं नामी।

हम सदैव तेरा गुण गायें,
सब विधि तेरा सुयश बढ़ायें।

भारत _ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
भारत _ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems

वंदना कविता | सोहनलाल द्विवेदी

वंदिनी तव वंदना में
कौन सा मैं गीत गाऊँ?

स्वर उठे मेरा गगन पर,
बने गुंजित ध्वनित मन पर,
कोटि कण्ठों में तुम्हारी
वेदना कैसे बजाऊँ?

फिर, न कसकें क्रूर कड़ियाँ,
बनें शीतल जलन–घड़ियाँ,
प्राण का चन्दन तुम्हारे
किस चरण तल पर लगाऊँ?

धूलि लुiण्ठत हो न अलकें,
खिलें पा नवज्योति पलकें,
दुर्दिनों में भाग्य की
मधु चंद्रिका कैसे खिलाऊँ?

तुम उठो माँ! पा नवल बल,
दीप्त हो फिर भाल उज्ज्वल!
इस निबिड़ नीरव निशा में
किस उषा की रश्मि लाऊँ?

वन्दिनी तव वन्दना में
कौन सा मैं गीत गाऊँ?

हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं कविता | सोहनलाल द्विवेदी

हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं,
नादान उमर के कच्चे हैं,
पर अपनी धुन के सच्चे हैं!
जननी की जय-जय गाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

अपना पथ कभी न छोड़ेंगे,
अपना प्रण कभी न तोड़ेंगे,
हिम्मत से नाता जोड़ेंगे!
हम हिम गिर पर चढ़ जाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

हम भय से कभी न डोलेंगे,
अपनी ताकत को तोलेंगे,
माता के बंधन खोलेंगे!
हम इसकी शान बढ़ाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

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हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं _ सोहनलाल द्विवेदी कविताए_Sohanlal Dwivedi Poems
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हाथी और खरगोश कविता | सोहनलाल द्विवेदी

खटपट, खटपट, खटपट, खटपट,
क्या करते हो बच्चो, नटखट?
आओ, इधर दौड़ कर झटपट,
तुमको कथा सुनाऊँ चटपट!

नदी नर्मदा के निर्मल तट,
जहाँ जंगलों का है जमघट,
वहीं एक था बड़ा सरोवर,
जिसकी शोभा बड़ी मनोहर!

इसी सरोवर में निशिवासर,
हाथी करते खेल परस्पर।
एक बार सूखा सर वह जब,
तब की कथा सुनो बच्चो अब।

पड़े बड़े दुख में हाथी सब,
कहीं नहीं जल दिखलाया जब-
सारे हाथी होकर अनमन,
चले ढूँढ़ने जल को बन बन।

मेहनत कभी न होती निष्फल,
उनको मिला सरोवर निर्मल।
शीतल जल पीकर जी भरकर,
लौटे सब अपने अपने घर।

हाथी वहीं रोज जाते सब,
खेल खेल कर घर आते सब।
किन्तु, सुनो बच्चो चित देकर,
जहाँ मिला यह नया सरोवर।

वहीं बहुत खरगोशों के घर,
बने हुए थे सुन्दर सुन्दर।
हाथी के पाँवों से दब कर,
वे घर टूट बन गए खँडहर!

खरगोशों के दिल गए दहल,
कितने ही खरगोश गए मर,
वे सब थे अनजान बेखबर!

सब ने मिलकर धीरज धारा,
सबने एक विचार विचारा।
जिससे टले आपदा सारी,
ऐसी सब ने युक्ति विचारी।

उनमें था खरगोश सयाना,
जिसने देखा बहुत जमाना।
बात सभी को उसकी भायी,
उसने कहा, करो यह भाई-

बने एक खरगोश दूत अब,
काम करे बनकर सपूत सब।
जाकर कहे हाथियों से यह,
उसके सभी साथियों से यह,

हम खरगोश, हमारा यह सर,
श्री खरगोश हमारे नृपवर।
चारु चन्द्र उनका सिंहासन,
जहाँ बैठ देते वे दर्शन!

हमको है नृपवर ने भेजा,
हुक्म उनहोंने हमें सहेजा।
जाकर कहो हाथियों से यह,
उनके सभी साथियों से यह।

अब न कभी तुम सर में आना,
होगा वरना मौत बुलाना!
जुल्म किया तुमने हम पर,
सब घर तोड़ बनाये खँडहर!!

अगर नहीं मानोगे कहना,
तुम्हें पड़ेगा संकट सहना।
मैं बिजुली का अंकुश लेकर,
नाश करूँगा तुम्हें पकड़ कर!

इससे अच्छा है मत आओ,
खरगोशों को अब न सताओ।
किसी दूसरे सर को ढूँढ़ो,
अब न कभी आना तुम मूढ़ो!

मुमकिन है सच बात जानकर,
मुमकिन है यह बात मानकर।
हाथी फिर न सरोवर आवें,
और हमारे घर बच जावें।

हुई बात भी कुछ ऐसी ही,
सोची गई घात जैसी ही।
अब आगे की सुनो कहानी,
चला दूत ले हुक्म जबानी।

सभी हाथियों के ढिंग आया,
गरज गरज कर हुक्म सुनाया।
हाथी सहम गए सब सुन सुन,
हाथी सभी हो गए गुन मुन!

किन्तु एक था उनमें बलधर,
वह बोला चिंघाड़ मार कर।
बात तुम्हारी जानूँ सच जब,
बात तुम्हारी मानूँ सच सब!

बातें तुम न मुझे सिखलाओ,
बस अपने नृप को दिखलाओ।
चारु चन्द्र जिनका सिंहासन,
जहाँ बैठ वे देते दर्शन।

बोला दूत, चलो तुम सर को,
मैं दिखलाऊँगा नृपवर को।
आये दूत और हाथी सर,
राह निखरने लगी वहीं पर।

हुई रात जब, झलमल झलमल,
नभ में तारे निकले निर्मल।
खिली चाँदनी, खिला सरोवर,
दृश्य बड़ा ही बना मनोहर।

आया चाँद मनोहर सुन्दर,
नीले नीले आसमान पर।
उसकी छाया निर्मल जल पर,
चमकी अतिशय सुन्दर सुन्दर।

चारु चन्द्र जिनका सिंहासन,
जहाँ बैठ देते वह दर्शन!
हाथी ने देखा तब जल पर,
बिम्ब चन्द्रमा का अति सुन्दर।

बोला दूत, शीश ऊपर कर,
देखो! वहाँ, बीच में, जल पर,
आसमान से अभी उतर कर,
आये श्रीखरगोश नृपतिवर।

अहा! चाँद के बीच मंच पर,
है खरगोश दीखता मनहर!
मन ही मन यह समझा बलधर,
श्रीखरगोश यही हैं नृपवर!

सचमुच हुक्म उन्होंने भेजा,
इसको सचमुच काम सहेजा।
हाथी लौट तुरत सर आया,
बोला, नृपवर से मिल आया।

बोला सभी हाथियों से वह,
बोला सभी साथियों से वह।
जाना ठीक न सचमुच सर में,
जाना मौत बुलाना घर में।

तब से कभी न हाथी आये,
और न उनके साथी आये।
खरगोशों ने युक्ति निकाली,
आयी बला शीश से टाली!

फिर बन गए नये घर सुन्दर,
लहरीं जिनपर लता मनोहर।
हुए सभी खरगोश मगन मन,
रहने लगे खुशी हो छन छन।

मेंढक और साँप कविता | सोहनलाल द्विवेदी

गंगदत्त मेंढक की बच्चो,
सुन लो एक कहानी।
इसका मर्म अगर समझोगे,
बन जाओगे ज्ञानी।

बहुत दिनों की बात, कथा भी,
यह है बहुत पुरानी।
पर इतनी अच्छी है मुझको,
अब तक याद जबानी।

एक कुआँ था बड़ा, भरा था
जिसमें गहरा पानी,
राजा उसका गंगदत्त था,
गंगदत्तनी रानी।

वहीं और मेंढक मेंढकियाँ
रहती थीं मनमानी-
जल में हिलमिल खेला करतीं-
करती थीं शैतानी।

गंगदत्त को एक रोज,
इन सबने बहुत सताया।
गंगदत्त राजा के मन में
गुस्सा भी तब आया।

गंगदत्त ने कहा चलूँ मैं
इनको मजा चखाऊँ,
गंगदत्त राजा तब ही मैं
दुनियाँ में कहलाऊँ।

गंगदत्त चल पड़ा सोचता
यों ही बातें मन में।
नागदत्त नागों का राजा
उसे मिल गया बन में।

गंगदत्त ने सोचा मन में,
इसको दोस्त बनाऊँ-
तो मैं दुष्ट मेंढकों से फिर
बदला खूब चुकाऊँ।

गंगदत्त ने कहा, जरा
ठहरो, नागों के राजा!
अभी ढूँढने चला तुम्हारे
घर का मैं दरवाजा।

मुझे कूप के सभी मेंढकों
ने है बहुत सताया।
इसीलिए, मैं दुखिया बन कर
शरण तुम्हारी आया।

चाहो तुम ही मुझको खा लो,
चाहो मुझे बचाओ।
पर इन दुष्ट मेंढकों से तुम
मेरा पिंड छुड़ाओ।

नागदत्त ने कहा, नहीं
मन में घबराओ भाई!
बतलाओ तो मुझे कौन सी
आफत तुम पर आयी?

गंगदत्त ने नागदत्त को,
तब सब हाल बताया-
कैसे वहां मेंढकों ने था,
उसको खूब सताया।

नागदत्त ने कहा, चलो,
दुष्टों को अभी दिखाओ,
उनका अभी नाश करता हूँ,
सब के नाम गिनाओ।

गंगदत्त ने मन में कुछ भी,
सोचा नहीं विचारा।
चला जाति का नाश कराने,
वह पापी हत्यारा!

गंगदत्त यों नागदत्त को,
अपने घर ले आया।
उसने सभी मेंढकों को,
पल भर में तुरत दिखाया।

नागदत्त का क्या कहना था,
लगा सभी को खाने।
मची कुएँ में भारी हलचल
लगे सभी चिल्लाने!

उसका हाल न पूछो, कहते
बनता नहीं जबानी,
गला रुका जाता, आँखों में
भर भर आता पानी।

नागदत्त यों लगा कुएँ में
खाने सुख से, जीने,
खाते पीते बीत गये जब
यों ही कई महीने;

हुआ जाति नाश गए जब
सारे मेंढक मारे;
गंगदत्त से नागदत्त तब
बोला कुआँ किनारे-

बात तुम्हारी मान, यहाँ पर
रहता हूँ मैं भाई!
भोजन और बताओ, वरना
होगी बड़ी बुराई।

गंगदत्त यह सुनकर चौंका
और बहुत घबराया।
बड़ी देर चुपचाप रहा, कुछ
उसकी समझ न आया।

नागदत्त ने कहा, वंश
वालों को अपने लाओ।
अब मैं उनको ही खाऊँगा,
जाओ, जल्दी आओ।

टर्र! टर्र! कर गंगदत्त ने
कहा, सुनो हे भाई!
अब तुम अपने घर को जाओ,
तो हो बहुत भलाई।

फुफकारा तब नागदत्त ने
कहा, कहाँ अब जाऊँ?
मेरा घर तो उजड़ गया
क्या फिर से नया बनाऊँ?

अब मैं हरदम यहीं रहूँगा
कहीं नहीं जाऊँगा;
तुम लोगों को पकड़-पकड़ कर
रोज यहीं खाऊँगा!

इस प्रकार जब गंगदत्त पर
गहरा संकट आया,
उसने अपने रिश्तेदारों को
ला ला कर पहुँचाया।

नागदत्त यों रोज रोज
रिश्तेदारों को खाता,
गंगदत्त यह देख देख
मन ही मन था घबराता।

जमुनादत्त पुत्र था प्यारा
बड़े प्यार से पाला,
नागदत्त ने एक रोज ले
उसको भी खा डाला।

अब मत पूछो गंगदत्त की,
वह रोया चिल्लया;
बड़ी देर बेहोश रहा, कुछ
उसको सूझ न पाया।

गंगदत्तनी ने खुद जाकर
तब उसको समझाया।
कैसे प्राण बचें उसने
इसका उपाय बतलाया।

गंगदत्तनी बोली, अब तो
कहना मानो स्वामी!
इसमें ही कल्याण तुम्हारा
होगा, जानो स्वामी।

सब तो नाश कराया, अब तो
इसको छोड़े स्वामी।
निकल चलो बाहर, इस घर से
नाता तोड़ो स्वामी।

गंगदत्त औ गंगदत्तनी ने
घर छोड़ा अपना।
जैसा काम किया वैसा ही
उनको पड़ा भुगतना।

गंगदत्त मेंढक की बच्चो!
पूरी हुई कहानी!
मैंने याद रखी है, तुम भी
रखना याद जबानी।

जब घर में हो फूट, कभी,
दुश्मन को नहीं बुलाना।
गंगदत्त मेंढक बनकर मत
जग में हंसी करना!

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