Poems on Mother in Hindi| माँ पर कविताएं |

21+ माँ पर कविताएं | Mom Poems | Poems on Mother in Hindi

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Best Poems in Hindi on Mother | माँ पर कविताएं

  1. माँ पर कविता | कल्पना लालजी | Small Poem on Mother in Hindi
  2. माँ पर कविता | कविता गौड़ | Poem on Mother in Hindi For Class 1
  3. माँ पर कविता | कविता वाचक्नवी | Poem on Mother in Hindi for Class 2
  4. माँ पर कविता | कुँअर बेचैन |Poem on Mother in Hindi for Class 9
  5. माँ पर कविता| कृष्ण कुमार यादव | Maa Poem in Hindi Lyrics
  6. माँ पर कविता | केशव | Poem in Hindi on Mother and Father
  7. माँ पर कविता | गुरप्रीत | Hindi Poem Pyari Maa
  8. माँ पर कविता | जगदीश व्योम | Poem in Hindi on Mother
  9. माँ पर कविता | तेज राम शर्मा | Poem on Mothers Day in Hindi
  10. माँ पर कविता | नरेन्द्र मोहन | Hindi Kavita on Mother
  11. माँ पर कविता प्रभाकर माचवे | Poem on Mother in the Hindi Language
  12. माँ पर कविता | प्राण शर्मा | Poem on Mother in Hindi for Class 4
  13. माँ पर कविता | मोहनजीत | Emotional Poems on Mother in Hindi
  14. माँ पर कविता| रमेश तैलंग
  15. माँ पर कविता | शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
  16. माँ पर कविता | श्रीकृष्ण सरल
  17. माँ पर कविता | हबीब जालिब
  18. अम्मा | कल्पना लालजी
  19. माँ पर नहीं लिख सकता कविता | चन्द्रकान्त देवताले
  20. मेरी माँ | अजित कुमार
  21. मेरी माँ | रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

माँ | कल्पना लालजी | Small Poem on Mother in Hindi

आज फिर एक बार
झनझना उठा ह्रदय का एक छोटा सा तार
कोयल फिर कूकी बागों में
कलियों ने ली अंगडाई
महकी मेरे मन की वादी
भंवरों ने भी दौड लगाई
ललचाई नज़रे उठी इन्द्रधनुष की ओर
धरती की सौंधी खुशबू से भीग चली थी भोर
मन मयूर उड़ने लगा जीवन में पहली बार
मेरे आँचल में आ सिमटा अब सारा संसार
गुदगुदा गया मुझे कोमल स्पर्श उसका
नन्ही सी इस बगिया में स्वप्न देखा था जिसका
घुघराली चंचल अलके चूमे उसका मुखडा
मेरे पलने में झूल रहा चाँद का इक टुकड़ा
किलकारी से अपनी गूंजा दिया आँगन मेरा
आगमन उसका लाया सतरंगी नया सवेरा
तुतलाते होठों से जब माँ कह मुझे पुकारा
माँ की ममता और प्रेम से धन्य हुआ जीवन मेरा

माँ पर कविता | कविता गौड़ | Poem on Mother in Hindi For Class 1

माँ की जान कहाँ होती है?
बच्चों में।
माँ की आन कहाँ होती है?
बच्चों से।
माँ का मान कहाँ होता है?
बच्चों में।
माँ की ममता कहाँ होती है?
बच्चों में।
माँ की सुबह कहाँ होती है?
बच्चों से।
माँ की शाम कहाँ होती है?
बच्चों में।
माँ की आस कहाँ होती है?
बच्चों से।
माँ की सोच कहाँ होती है?
बच्चो में।
माँ का अंत कहाँ होता है?
बच्चों में।
माँ की जान कहाँ होती है?
बच्चों में।

माँ पर कविता| कविता वाचक्नवी | Poem on Mother in Hindi for Class 2

माँ
तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने,
कभी गाई होगी
याद नहीं
फिर भी जाने कैसे
मेरे कंठ से
तुम झरती हो।

तुम्हारी बंद आँखों के सपने
क्या रहे होंगे
नहीं पता
किंतु मैं
खुली आँखों
उन्हें देखती हूँ।

मेरा मस्तक
सूँघा अवश्य होगा तुमने
मेरी माँ!
ध्यान नहीं पड़ता
परंतु
मेरे रोम-रोम से
तुम्हारी कस्तूरी फूटती है।
तुम्हारा ममत्व
भरा होगा लबालब
मोह से,
मेरी जीवनासक्ति
यही बताती है।
और
माँ!
तुमने कई बार

छुपा-छुपी में
ढूंढ निकाला होगा मुझे
पर मुझे
सदा की
तुम्हारी छुपा-छुपी
बहुत रुलाती है;
बहुत-बहुत रुलाती है;
माँSSS!!!

माँ पर कविता | कुँअर बेचैन |Poem on Mother in Hindi for Class 9

माँ!
तुम्हारे सज़ल आँचल ने
धूप से हमको बचाया है।
चाँदनी का घर बनाया है।

तुम अमृत की धार प्यासों को
ज्योति-रेखा सूरदासों को
संधि को आशीष की कविता
अस्मिता, मन के समासों को

माँ!
तुम्हारे तरल दृगजल ने
तीर्थ-जल का मान पाया है
सो गए मन को जगाया है।

तुम थके मन को अथक लोरी
प्यार से मनुहार की चोरी
नित्य ढुलकाती रहीं हम पर
दूध की दो गागरें कोरी

माँ!
तुम्हारे प्रीति के पल ने
आँसुओं को भी हँसाया है
बोलना मन को सिखाया है।

माँ पर कविता | कृष्ण कुमार यादव | Maa Poem in Hindi Lyrics

मेरा प्यारा-सा बच्चा’
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नज़र न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज़ बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चौका-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाए।

लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जाएगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के क़दम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के क़दमों का इंतज़ार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई ज़िन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्पराएँ व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की ख़ुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।

माँ पर कविता | केशव | Poem in Hindi on Mother and Father

माँ अपने अँधेरे को
कहती नहीं
सुनती है
फिर हमें उससे दूर रखने के लिए
चुपचाप
सुबह का सपना बुनती है
माँ
हमारी तकलीफ में
उपस्थिति रहती है
अपनी तकलीफ से मोहलत लेकर
हमारी दुनिया में
माँ के अलावा भी
और बहुत कुछ
माँ की दुनियाँ में
सिर्फ एक औरत
सदियों से
हमारे सिवा
माँ की दहलीज़ हम
जिसे लाँघती नहीं वह
सपने में भी
हमारे लिए
आँगन
जिसमें खलते-खेलते
एक दिन हम
भीड़ में शामिल हो जाते अचानक
माँ
नहीं होती भीड़
इसलिए
भीड़ के लिए
मंगल कामना के साथ
चुपचाप लौट जाती
अपने भीतर प्रतीक्षारत
औरत के पास
माँ एक नदी है
बेशक हमारे लिए
पर अपने लिए
वह एक औरत है
अपने ही जल के लिए छटपटाती

माँ
हमारे लिए
एक उत्तर
अपने लिए एक सवाल
युग-युग से
माँ का यही हाल।

माँ पर कविता | गुरप्रीत | Hindi Poem Pyari Maa

माँ | गुरप्रीत | Poems On Mother in Hindi

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि जन्म दिया है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि पाला-पोसा है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए
कि उससे
अपने दिल की बात कहने के लिए
मुझे शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती।

माँ पर कविता | जगदीश व्योम | Poem in Hindi on Mother

माँ कबीर की साखी जैसी
तुलसी की चौपाई-सी
माँ मीरा की पदावली-सी
माँ है ललित रुबाई-सी

माँ वेदों की मूल चेतना
माँ गीता की वाणी-सी
माँ त्रिपिटिक के सिद्ध सुत्त-सी
लोकोक्तर कल्याणी-सी

माँ द्वारे की तुलसी जैसी
माँ बरगद की छाया-सी
माँ कविता की सहज वेदना
महाकाव्य की काया-सी

माँ अषाढ़ की पहली वर्षा
सावन की पुरवाई-सी
माँ बसन्त की सुरभि सरीखी
बगिया की अमराई-सी

माँ यमुना की स्याम लहर-सी
रेवा की गहराई-सी
माँ गंगा की निर्मल धारा
गोमुख की ऊँचाई-सी

माँ ममता का मानसरोवर
हिमगिरि-सा विश्वास है
माँ श्रृद्धा की आदि शक्ति-सी
कावा है कैलाश है

माँ धरती की हरी दूब-सी
माँ केशर की क्यारी है
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर
माँ की छवि ही न्यारी है

माँ धरती के धैर्य सरीखी
माँ ममता की खान है
माँ की उपमा केवल है
माँ सचमुच भगवान है।

माँ पर कविता | तेज राम शर्मा | Poem on Mothers Day in Hindi

कितना कठिन है
माँ पर कविता लिखना
क्योंकि जब स्मित सपनों में सोया होता है घर
माँ कर चुकी होती है पार
दुर्गम पहाड़ी पगडण्डियाँ
और जब तुम आँख मलते उठते हो
माँ पर्वत की चोटी के उस पार
अक्षौहिणी सेना की तरह काट रही होती है घास


मातृत्व के गुरुत्वाकर्षण से
स्तनों से स्वतः रिसता है दूध
उघड़ जाती है सीवन
घासनी में सूरज से लड़ते हुए
सूरज के रथ को पीछे धकेल कर
जल्दी-जल्दी समेटती है घास

घास के बोझ तले
जब भरती है तेज़ डग
तो प्यासी धरती
आकण्ठ पी जाती है उसके
दूध और पसीने की रसधार

घास के डैने पसारे
उड़ती है वह
घर की ओर
माँ के लौटते ही
अँधेरे कोने में लौटती है धूप
दाँतों में जुगाली
घण्टे में नाद
धमनियों में रक्त
आग में ताप
मूर्छित समय में लौटते प्राण

मुझे गोद में उठाने से पहले
पानी से धोती है दूध रिसते उजले स्तन
कहीं पसीने की विरासत न घुल जाए
लाडले के दूध में।

माँ पर कविता | नरेन्द्र मोहन | Hindi Kavita on Mother

एक मायावी तंत्र में जकड़ा
कातर चुप्पी में गुम
भभक उठता हूँ कभी-कभी
तो याद आती है माँ!

सारे तारों को बराबर संतुलन में
खींचे रखते हुए भी अपनी भभक में
माँ की-सी भभक का आभास क्यों होता है
क्यों एक क्रुद्ध आकृति मेरे स्नायु-तंत्र को
खींचती और तोड़ती-सी लगती है

सोचता हूँ
परिस्थिति और संस्कार को
नागफाँस में
यों ही नहीं भभक उठती होगी माँ
हताश मासूम आँखों में करुणा लिए
भयाक्रांत
जैसे कोई शरणार्थी
कटे हुए ख़ूनी दृश्यों को लांघता, बचता, घिसटता

माँ! पालती, दुलारती, उसारती घर
एक-एक कण को बटोरती-सहेजती
आत्म-सम्मान के ढुह पर ठहरी-ठहरी
कैसे बेघर हो खड़ी है सामने
बदहवासी में काँपती देखती है मुझे
आग्नेय नेत्रों से
टूटी अंगुली के दर्द से कराहती निरीह

ताकती है मुझे नवजात शिशु के उमड़ते भाव से
जबकि मैं जवान
उसकी आस्था से बना पुख़्ता और बलवान
मेरा जिस्म पत्थर-सा पड़ा
क्यों नहीं उठा पाता उसे रोक पाता
उस तट पर जाने से
जहाँ डूबने से बच नहीं पाया कोई

‘कम्बल पर अभिमंत्रित एक अकेलेपन में डूब गया था’ केश कम्बली
कला साधना में
लय की चरमता में लीन
और एक अकेलेपन में डूब गई माँ
छुटी-कटी लय
खंडित हिस्सों में बिखरी, लुटी, असहाय

एक मायावी तंत्र में जकड़ा
कतर चुप्पी में गुम
भभक उठता हूँ कभी-कभी
तो याद आती है माँ!

माँ पर कविता | प्रभाकर माचवे | Poem on Mother in Hindi Language

ईश्वर का वरदान है माँ
हम बच्चों की जान है माँ
मेरी नींदों का सपना माँ
तुम बिन कौन है अपना माँ
तुमसे सीखा पढ़ना माँ
मुश्किल कामों से लडना माँ
बुरे कामों में डाँटती माँ
अच्छे कामों में सराहती माँ
कभी मित्र बन जाती माँ
कभी शिक्षक बन जाती माँ
मेरे खाने का स्वाद है माँ
सब कुछ तेरे बाद है माँ
बीमार पडूँ तो दवा है माँ
भेदभाव ना कभी करे माँ
वर्षा में छतरी मेरी माँ
धूप में लाए छाँव मेरी माँ
कभी भाई, कभी बहन, कभी पिता बन जाती माँ
ग़र ज़रूरत पडे तो दुर्गा भी बन जाती माँ
ऐ ईश्वर धन्यवाद है तेरा दी मुझे जो ऐसी माँ
है विनती एक यही तुमसे हर बार बने ये हमारी माँ

माँ पर कविता | प्राण शर्मा | Poem on Mother in Hindi for Class 4

माँ | प्राण शर्मा | Poems On Mother in Hindi

माँ की निर्मल काया
उससे लिपटी है
सुन्दरता की छाया

युग–युग की क्षमता है
पूजा की जैसी
हर माँ की ममता है

धन धान्य बरसता है
माँ के हंसने से
सारा घर हंसता है

मदमस्ती हरसू है
माँ की लोरी में
मुरली सा जादू है

दुनिया में न्यारी माँ
हंसती- हंसाती है
बच्चों की प्यारी माँ

हर बच्चा पलता है
सच है मेरे यारो
घर माँ से चलता है

मन ही मन रोती हैं
बच्चों के दुःख में
माएं कब सोती हैं

हर बात में कच्चा है
माँ के आगे तो
बूढा भी बच्चा है

माँ कैसी होती है
पारस सा मन है
माँ ऐसी होती है

कुछ कद्र करो भाई
बेटे हो फिर भी
क्यों पीड़ित है माई

माँ पर कविता | मोहनजीत | Emotional Poems on Mother in Hindi

मैं उस मिट्टी में से उगा हूँ
जिसमें से माँ लोकगीत चुनती थी

हर नज्म लिखने के बाद सोचता हूँ-
क्या लिखा है?
माँ कहाँ इस तरह सोचती होगी!

गीत माँ के पोरों को छूकर फूल बनते
माथे को छूते- सवेर होती
दूध-भरी छातियों को स्पर्श करते
तो चांद निकलता

पता नहीं गीत का कितना हिस्सा
पहले का था
कितना माँ का

माँ नहाती तो शब्द ‘रुनझुन’ की तरह बजते
चलती तो एक लय बनती

माँ कितने साज़ों के नाम जानती होगी
अधिक से अधिक ‘बंसरी’ या ‘अलग़ोजा’
बाबा(गुरु नानक) की मूरत देखकर
‘रबाब’ भी कह लेती थी

पर लोरी के साथ जो साज़ बजता है
और आह के साथ जो हूक निकलती है
उससे कौन-सा साज़ बना
माँ नहीं जानती थी

माँ कहाँ खोजनहार थी !
चरखा कातते-कातते सो जाती
उठती तो चक्की पर बैठ जाती

भीगी रात का माँ को क्या पता !
तारों के साथ परदेशी पिता की प्रतीक्षा करती

मैं भी जो विद्वान बना घूमता हूँ
इतना ही तो जानता हूँ
माँ साँस लेती तो लगता
रब जीवित है!

माँ पर कविता | रमेश तैलंग

माँ | रमेश तैलंग| Poems On Mother in Hindi

घर में अकेली माँ ही बस
सबसे बड़ी पाठशाला है।
जिसने जगत को पहले-पल
ज्ञान का दिया उजाला है।

माँ से हमने जीना सीखा,
माँ में हमको ईश्वर दीखा,
हम तो हैं माला के मनके,
माँ मनकों की माला है।

माँ आँखों का मीठा सपना,
माँ साँसों में बहता झरना,
माँ है एक बरगद की छाया
जिसने हमको पाला है।

माँ कितनी तकलीफ़ें झेल,
बाँटे सुख, सबके दुख ले ले।
दया-धर्म सब रूप हैं माँ के,
और हर रूप निराला है।

माँ पर कविता | शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

तुम्हीं मिटाओ मेरी उलझन
 कैसे कहूँ कि तुम कैसी हो
 कोई नहीं सृष्टि में तुमसा
 माँ तुम बिल्कुल माँ जैसी हो।

 ब्रह्मा तो केवल रचता है
 तुम तो पालन भी करती हो
 शिव हरते तो सब हर लेते
 तुम चुन चुन पीड़ा हरती हो
 किसे सामने खड़ा करूँ मैं
 और कहूँ फिर तुम ऐसी हो।

 ज्ञानी बुद्ध प्रेम बिन सूखे
 सारे देव भक्ति के भूखे
 लगते हैं तेरी तुलना में
 ममता बिन सब रूखे रूखे
 पूजा करे सताये कोई
 सब की सदा तुम हितैषी हो।

 कितनी गहरी है अद् भुत सी
 तेरी यह करुणा की गागर
 जाने क्यों छोटा लगता है
 तेरे आगे करुणा सागर
 जाकी रहि भावना जैसी
 मूरत देखी तिन्ह तैसी हो।

 मेरी लघु आकुलता से ही
 कितनी व्याकुल हो जाती हो
 मुझे तृप्त करने के सुख में
 तुम भूखी ही सो जाती हो
 सब जग बदला मैं भी बदला
 तुम तो वैसी की वैसी हो।

 तुम से तन मन जीवन पाया
 तुमने ही चलना सिखलाया
 पर देखो मेरी कृतघ्नता
 काम तुम्हारे कभी नआया
 क्यों करती हो क्षमा हमेशा
 तुम भी तो जाने कैसी हो
 माँ तुम बिल्कुल माँ जैसी हो।

माँ पर कविता| श्रीकृष्ण सरल

इस एक शब्द ‘माँ’ में है मंत्र–शक्ति भारी
यह मंत्र–शक्ति सबको फलदायी होती है,
आशीष–सुधा माँ देती अपने बच्चों को
वह स्वयं झेलती दुःख, विषपायी होती है।

माँ से कोमल है शब्द–कोश में शब्द नहीं
माँ की ममता से बड़ी न कोई ममता है,
उपमान और उपमाएँ सबकी मिल सकतीं
लेकिन दुनिया में माँ की कहीं न समता है।

यह छोटा–सा ‘माँ’ शब्द, सिन्धु क्षमताओं का
तप–त्याग–स्नेह से रहता सदा लबालब है,
खारा सागर, माँ की समता क्या कर पाए
माँ की महानता से महान कोई कब है।

हम लोग जिसे ममता कहकर पुकारते हैं
बौनी है वह भी माँ की ममता के सम्मुख,
हम लोग जिसे क्षमता कहकर पुकारते हैं
बौनी है वह भी माँ की ममता के सम्मुख।

माँ की महानता से, महानता बड़ी नहीं
माँ के तप से, होता कोई तप बड़ा नहीं,
साकार त्याग भी माँ के आगे बौना है
माँ के सम्मुख हो सकता कोई खड़ा नहीं।

हैं त्याग–आग अनुराग मातृ–उर में पलते
वर्षा–निदाघ आँखों में पलते आए हैं,
भावना और कर्त्तव्य रहे ताने–बाने
चरमोत्कर्ष ममता – क्षमता ने पाए हैं।

बेटे के तन का रोयाँ भी दुखता देखे
माता आकुल–व्याकुल हो जाया करती है,
जब पुत्र–दान की माँग धरा–माता करती
इस कठिन कसौटी पर माँ खरी उतरती है।

वह धातु अलग, जिससे माँ निर्मित होती है
उसको कैसा भी ताप नहीं पिघला सकता,
हल्के से हल्का ताप पुत्र – पुत्री को हो
माँ के मन के हिम को वह ताप गला सकता|

दुनिया में जितने भी सागर, सब उथले हैं
माता का उर प्रत्येक सिन्धु से गहरा है,
कोई पर्वत, माँ के मन को क्या छू पाए
माँ के सम्मुख कोई उपमान न ठहरा है|

इतनी महानता भारत की माताओं में
अवतारों को भी अपनी गोद खिलाती हैं,
हो राम – कृष्ण गौतम या कोई महावीर
माताएँ हैं, जो उनको पाठ पढ़ाती हैं।

कोई जीजा माँ किसी शिवा को शेर बना
जब समर–भूमि में सह–आशीष पठाती है,
तो बड़े – बड़े योद्धा भी भाग खड़े होते
अरि के खेमों में काई–सी फट जाती है।

कोई जगरानी किसी चन्द्रशेखर को जब
निज दूध पिला जीवन के पाठ पढ़ाती है,
वह दूध खून का फव्वारा बन जाता है
वह मौत, मौत को भी झकझोर रुलाती है|

कोई विद्या माँ, भगत सिंह से बेटे को
जब घोल–घोल घुट्टी में क्रान्ति पिलाती है,
तो उसका शैशव बन्दूकें बोने लगता
बरजोर जवानी फाँसी को ललचाती है।

जब प्रभावती कोई सुभाष से बेटे को
भारत–माता की व्यथा–कथा बतलाती है,
हर साँस और हर धड़कन उस विद्रोही की
धरती की आजादी की बलि चढ़ जाती है।

कोई चाफेकर – माता तीन – तीन बेटे
भारत माता के ऊपर न्योछावर करती,
कहती, चौथा होता तो वह भी दे देती
आँसू न एक गिरता, वह आह नहीं भरती।

तप और त्याग साकार देखना यदि अभीष्ट
तो देखे कोई भारत की माताओं को,
कलियों में किसलय में भी लपटें होती हैं
तो देखे कोई भारत की ललनाओं को।

कर्त्तव्य हमारा, हम माताओं को पूजें
आशीष कवच पाकर उनका, निर्भय विचरें,
हम लाज रखें उसकी, जो हमने दूध पिया
माँ और बड़ी माँ का हम ऊँचा नाम करें।

माता माता तो है ही, गुरु भी होती है
माता ही पहले–पहले सबक सिखाती है,
माँ घुट्टी में ही जीवन घोल पिला देती
माँ ही हमको जीवन की राह दिखाती है।

हम जननी की, भारत–जननी की जय बोलें
निज जीवन देकर उनके कर्ज चुकाएँ हम
जो सीख मिली है, उसका पालन करने को
निज शीश कटा दें, उनको नहीं झुकाएँ हम।

माँ पर कविता | हबीब जालिब

बच्चों पे चली गोली
माँ देख के यह बोली
यह दिल के मेरे टुकड़े
यूँ रोए मेरे होते
मैं दूर खड़ी देखूँ
ये मुझ से नहीं होगा

मैं दूर खड़ी देखूँ
और अहल-ए सितम खेलें
ख़ून से मेरे बच्चों के
दिन-रात यहाँ होली
बच्चों पे चली गोली
माँ देख के यह बोली
यह दिल के मेरे टुकड़े
यूँ रोए मेरे होते
मैं दूर खड़ी देखूँ
ये मुझ से नहीं होगा

मैदान में निकल आई
इक बर्क़-सी लहराई
हर दस्त-ए सितम कपड़ा
बंदूक भी ठहराई
हर सिम्त सदा गूँजी
मैं आती हूँ, मैं आई
मैं आती हूँ, मैं आई

हर ज़ुल्म हुआ बातिल
और सहम गए क़ातिल
जब उसने ज़बाँ खोली
बच्चों पे चली गोली
उस ने कहा ख़ून ख़्वारो !
दौलत के परस्तारो
धरती है यह हम सब की
इस धरती को नादानो
अंग्रेज़ों के दरबानो !
साहेब की अता करदाह
जागीर न तुम जानो
इस ज़ुल्म से बाज़ आओ
बैरक में चले जाओ
क्यों चंद लुटेरों की
फिरते हो लिए टोली
बच्चों पे चली गोली

अम्मा पर कविता | कल्पना लालजी

आज मगर अम्मा की बातें याद किसे हैं आती
भूली बिसरी एक कहानी बन कर रह गई अम्मा
जोड़–जोड़ में दर्द है उसके किसको जा दिखलाये
आँखों से आंसू पीती बैठी रह गई अम्मा

कभी नहीं सोचा था उसने ऐसा एक दिन होगा
सूनसान गलियारे में देखो खो गई अम्मा
आओ चल कर ढूंढे उसको देर न हो जाये
हाथ पकड़कर फिर से उसको घर के अंदर लायें

किस्मत से जो मिलती सबको हम उसको अपनाये
ठोकरों में जीने वाली चीज नहीं है अम्मा
आसमान से उतरी है जो बस हम सबकी खातिर
आज उसी की खातिर फिर हम क्यों न मर जाये

अपनी–अपनी सबने कह ली उसकी भी सुन लेते
जाने कौन से सपने देखो बुनती रह गई अम्मा
आकर उसके सपनों में हम दुनिया नई बसाएं
उससे है संसार हमारा उसको जा बतलाएं

अम्मा के मन को समझो ह्रदय में उसके झांको
दूध के संग घुट्टी में यही सिखाती अम्मा
अपनी रोटी देकर तुमको खुद भूखी सो जाती
फिर भी तू उसको न समझा कैसी तेरी अम्मा

जिसको भी देखो तुम आज अपनी धुन में रहता
रिश्तों की उलझन में कैसी उलझ गई है अम्मा
ताने –बाने बुनते –बुनते सारी उमर है बीती
फिर भी जाने क्यों थकी-थकी सी दिखती अपनी अम्मा

पालने से अब भी आती तेरे हाथों की खुशबू
साँझ- सवेरे मुझे झुलाती जिसमे मेरी अम्मा
गोल – गोल चंदा सी रोटी मुंह में जाकर घुल जाती
ऐसे लम्हों की याद मुझे अब भी आती है अम्मा

आज मिले जो पल हमको उनको जाने न देना
मत भूलो इस उम्र में कर्जा है तुम पर अम्मा
सूद समेत समय पर जिसको तुम चुकता कर देना
एक बार बिछड गई तो फिर न आएगी अम्मा

माँ पर नहीं लिख सकता कविता | चन्द्रकान्त देवताले

माँ के लिए सम्भव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिऊँटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी-दो-चुटकी आटा डाल देती है
मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूँगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता!

मेरी माँ | अजित कुमार

वे हर मंदिर के पट पर अर्घ्य चढ़ाती थीं
तो भी कहती थीं-
‘भगवान एक पर मेरा है।’
इतने वर्षों की मेरी उलझन
अभी तक तो सुलझी नहीं कि-
था यदि वह कोई तो आख़िर कौन था?

रहस्यवादी अमूर्तन? कि
छायावादी विडंबना? आत्मगोपन?
या विरुद्धों के बीच सामंजस्य बिठाने का
यत्न करता एक चतुर कथन?

‘प्राण, तुम दूर भी, प्राण तुम पास भी!
प्राण तुम मुक्ति भी, प्राण तुम पाश भी।’
उस युग के कवियों की
यही तो परिचित मुद्रा थी
जिसे बाद की पीढ़ी ने
शब्द-जाल भर बता खारिज कर दिया…!

कौन जाने,
मारा ध्यान कभी इस ओर भी जाए
कुछ सच्चाइयाँ शायद वे भी हो सकती हैं
जो ऐसी ही किन्हीं
भूल-भुलइयों में से गुज़रती हुई
हमारे दिल-दिमाग पर दस्तक देने बार-बार आएँ।

मेरी माँ | रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चिड़ियों के जगने से पहले
जग जाती थी मेरी माँ।
ढिबरी के नीम उजाले में
पढ़ने मुझे बिठाती माँ।
उसकी चक्की चलती रहती
गाय दूहना, दही बिलोना
सब कुछ करती जाती माँ।
सही वक़्त पर बना नाश्ता
जीभर मुझे खिलाती माँ।
घड़ी नहीं थी कहीं गाँव में
समय का पाठ पढ़ाती माँ।
छप्पर के घर में रहकर भी
तनकर चलती –फिरती माँ।
लाग –लपेट से नहीं वास्ता
खरी-खरी कह जाती माँ।
बड़े अमीर बाप की बेटी
अभाव से टकराती माँ।
धन –बात का उधार न सीखा
जो कहना कह जाती माँ
अस्सी बरस की इस उम्र ने
कमर झुका दी है माना।
खाली बैठना रास नहीं
पल भर कब टिक पाती माँ।
गाँव छोड़ना नहीं सुहाता
शहर में न रह पाती माँ।
यहाँ न गाएँ ,सानी-पानी
मन कैसे बहलाती माँ।
कुछ तो बेटे बहुत दूर हैं
कभी-कभी मिल पाती माँ।
नाती-पोतों में बँटकर के
और बड़ी हो जाती माँ।
मैं आज भी इतना छोटा
कठिन छूना है परछाई।
जब –जब माँ माथा छूती है
जगती मुझमें तरुणाई।
माँ से बड़ा कोई न तीरथ
ऐसा मैंने जाना है।
माँ के चरणों में न्योछावर
करके ही कुछ पाना है।

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